गणेश चतुर्थी: आगमन का समय और पर्व का महत्व

8/18/2025 11:09:22 AM, Aniket

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गणेश चतुर्थी: आगमन का समय और पर्व का महत्व

गणेश चतुर्थी हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को आती है—आम तौर पर अगस्त या सितंबर में। वर्ष 2025 में यह 26 अगस्त (मंगलवार) को मनाई जाएगी।

भारत उत्सवों का देश है, जहाँ हर त्यौहार जीवन में नई ऊर्जा, उल्लास और अध्यात्म की अनुभूति कराता है। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है गणेश चतुर्थी। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेल-जोल का भी प्रतीक है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि गणेश चतुर्थी कब आती है और इसका क्या महत्व है।

गणेश चतुर्थी कब आती है?

गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि पंचांग के अनुसार भगवान गणेश का जन्मदिन मानी जाती है और प्रायः अगस्त–सितंबर के बीच पड़ती है। इस दिन से शुरू होकर उत्सव 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

गणेश चतुर्थी का महत्व

1) भगवान गणेश का जन्मोत्सव

पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश की रचना गंधक और मिट्टी से की थी। गणेश जी को बुद्धि, विवेक, समृद्धि और विघ्नहर्ता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।

2) नए कार्यों की शुभ शुरुआत

हिंदू परंपरा में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत “श्री गणेशाय नमः” के साथ की जाती है। जनश्रुति है कि गणेश जी की कृपा से कार्य सिद्धि होती है और बाधाएँ दूर होती हैं। इसी कारण लोग इस दिन नई योजनाएँ आरंभ करना शुभ मानते हैं।

3) सामाजिक और सांस्कृतिक एकता

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा को सामाजिक एकजुटता के लिए लोकप्रिय बनाया। आज भी पंडाल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती समाज में भाईचारा और सहभागिता को मजबूत करते हैं।

4) बच्चों और युवाओं में रचनात्मकता

झाँकियाँ, सजावट, कला-प्रदर्शन और सेवा कार्यों में भागीदारी से बच्चों और युवाओं में टीमवर्क, नेतृत्व और रचनात्मक सोच विकसित होती है।

5) पर्यावरण-संवेदी उत्सव

अब लोग इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, प्राकृतिक रंग और जल-संरक्षण जैसी पहलें अपनाते हैं। इससे श्रद्धा के साथ प्रकृति-सम्भार का संदेश भी प्रसारित होता है।

पूजा-विधि और प्रिय भोग

गणपति की प्रतिमा स्थापना के बाद व्रत, भोग, मंत्रोच्चारण, आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है। मोदक, लड्डू और दूर्वा गणेश जी के प्रिय माने जाते हैं। नियमित आरती से घर-परिवार में श्रद्धा, अनुशासन और सकारात्मकता का संचार होता है।

विसर्जन का भाव और संदेश

उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी को विसर्जन से होता है। “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के जयकारों के बीच विदाई इस सत्य का स्मरण कराती है कि जीवन में अनित्य है, पर आस्था, सेवा और सद्भाव स्थायी मूल्य हैं जिन्हें हर वर्ष फिर से जगाना है।

निष्कर्ष

गणेश चतुर्थी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक धरोहर और पर्यावरण-जन्य उत्तरदायित्व का पर्व है। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को आती है और 10 दिनों तक भक्तों के जीवन में आशा, ऊर्जा और उत्साह भरती है। गणेश जी की कृपा से बाधाएँ दूर होती हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है—यही इस उत्सव का सार है।

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