कुंभ मेला की स्थापना कब हुई थी? – एक ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण

7/31/2025 11:38:12 AM, Aniket

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🕉️ कुंभ मेला की स्थापना कब हुई थी? – एक ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण

जानिए कुंभ मेले का पौराणिक इतिहास, इसकी स्थापना, महत्व और यह भारत में कहाँ-कहाँ और कब आयोजित होता है।

📜 पौराणिक पृष्ठभूमि – समुद्र मंथन से उत्पत्ति

कुंभ मेला की शुरुआत की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। देवता और असुर अमृत प्राप्ति हेतु समुद्र का मंथन करते हैं और अमृत कलश (कुंभ) निकलता है। भगवान विष्णु उसे लेकर उड़ते हैं और 12 वर्षों तक चार स्थानों पर रुकते हैं — प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक

जहाँ-जहाँ अमृत की बूंदें गिरीं, वहीं कुंभ मेले की परंपरा आरंभ हुई।

🏛️ ऐतिहासिक साक्ष्य

हालांकि पौराणिक आधार बहुत प्राचीन है, परंतु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से कुंभ मेला की व्यवस्थित शुरुआत 7वीं–8वीं शताब्दी से मानी जाती है।

  • 📜 ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में प्रयागराज में विशाल मेले का उल्लेख किया।
  • 🕉️ आदि शंकराचार्य ने अखाड़ों और संत परंपरा को संगठित किया।
  • 📅 1870 में ब्रिटिश सरकार ने इसे पहली बार "कुंभ" नाम से दर्ज किया।
वर्ष स्थान विवरण
644 ई. प्रयागराज ह्वेनसांग का वर्णन
8वीं शताब्दी हरिद्वार आदि शंकराचार्य द्वारा अखाड़ों की स्थापना
1870 प्रयागराज ब्रिटिश रिकार्ड में पहला दर्ज कुंभ
2001 प्रयागराज 7 करोड़ श्रद्धालुओं का समागम

🌍 कुंभ मेला कहाँ-कहाँ लगता है?

  • 📍 प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) – गंगा, यमुना, सरस्वती संगम
  • 📍 हरिद्वार (उत्तराखंड) – गंगा नदी
  • 📍 उज्जैन (मध्यप्रदेश) – शिप्रा नदी
  • 📍 नासिक (महाराष्ट्र) – गोदावरी नदी

🔄 कुंभ मेला चक्र

  • हर 12 वर्षों में चारों स्थानों पर पूर्ण कुंभ मेला
  • हर 6 वर्षों में प्रयागराज में अर्धकुंभ
  • हर 144 वर्षों में एक बार प्रयागराज में महाकुंभ

🕉️ धार्मिक महत्व

मान्यता है कि कुंभ स्नान से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहाँ ऋषि-मुनि, संत, नागा साधु, श्रद्धालु, और पर्यटक एक साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं।

📅 आगामी कुंभ मेले की जानकारी

स्थान वर्ष प्रकार
प्रयागराज 2025 अर्धकुंभ
उज्जैन 2028 सिंहस्थ कुंभ
नासिक 2030 कुंभ
हरिद्वार 2033 पूर्ण कुंभ

🙏 निष्कर्ष

कुंभ मेला की स्थापना किसी एक वर्ष में नहीं हुई बल्कि यह सनातन धर्म की हजारों वर्ष पुरानी जीवंत परंपरा है। यह मेला न केवल आस्था और मोक्ष का प्रतीक है, बल्कि भारतीय संस्कृति की एकता, विविधता और आध्यात्मिकता का पर्व भी है।

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